ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को संजोए मीरजापुर है हर तरह के यात्रियों के लिए खास

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को संजोए मीरजापुर है हर तरह के यात्रियों के लिए खास

छोटे-छोटे झरनों की फुहार, रोमांचित करने वाले जल प्रपात तथा गुफा के पत्थरों पर बने भित्ति चित्र, मीरजापुर को बनाते हैं खास। धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों ही लिहाज से यह जगह बनाता है अपनी अलग पहचान। तो इन चीज़ों को अगर देखने को रखते हैं शौक, तो यह जगह आएगी आपको पसंद।

घंटाघर-शहर का दिल

एक समय में घंटाघर की घड़ी की गूंज से नगर क्षेत्र सहित आसपास के गांवों के लोग समय जानते थे। देशी पत्थर पर गौथिक शैली में महीन कारीगरी ने घंटाघर को अद्वितीय बना दिया है। तीन मंजिला 100 फुट ऊंटा घंटाघर 31 मई 1891 को 18000 रुपये की लागत से बनकर तैयार हुआ था। 1735 ईस्वी में लॉर्ड मरक्यूरियस वेलेस्ले नाम के एक अंग्रेज अफसर ने इस क्षेत्र की स्थापना मीरजापुर नाम से की, लेकिन नगर पालिका वर्ष 1920 में अस्तित्व में आई। वेलेस्ले के नाम पर ही नगर का पाश इलाका वेलेस्लीगंज और अब वासलीगंज के नाम से प्रसिद्ध है। पालिका परिषद ने 97 वर्ष का सफर सफलतापूर्वक तय कर लिया है। यह घंटाघर शहर का दिल कहा जाता है।

ओझला पुल

पवित्र पुण्यजला ओझला नदी के बारे में कहा जाता है कि यह अत्यंत पावन नदी है। इसमें Fान करने से मनुष्य अनेक पापों से मुक्त हो जाता है। इस नदी पर महंत परशुराम गिरि द्वारा ओझला पुल का निर्माण वर्ष 1850 में कराया गया, जो एक दिन के रुई कारोबार की आय से निर्मित किया गया था। इस पुल के गर्भ गृह में कई कक्ष बने हुए हैं, जिनमें प्राचीन काल में यात्री आराम फरमाया करते थे। यह पुल आज भी नगरवासियों को गंगा दर्शन के साथ ही विंध्यवासिनी मंदिर से सीधा जोड़ने का एकमात्र माध्यम है।

प्रदेश की पहली कॉटन मिल

बाबू बिहारीलाल को उत्तर प्रदेश की प्रथम कॉटन मिल का जनक कहा जाता है। वे सेठ शिरोमणि के नाम से विख्यात थे। उन्होंने वर्ष 1896 में विन्ध्याचल मार्ग के मध्य में पुतलीघर इलाके में तब पांच लाख रुपये की लागत से मिल बनवाई थी। यह उत्तर प्रदेश की पहली कॉटन मिल थी। वर्ष 1928 में इसमें आग लगने के कारण यह बंद हो गई।

कलात्मकता का प्रतीक पक्का घाट

नगर के त्रिमोहानी स्थित पक्काघाट सबसे प्रसिद्ध एवं दर्शनीय घाट है, इसकी विशेषता पत्थर पर खूबसूरत कारीगरी है। यहां आकर 70 सीढि़यां उतरने के साथ आप गंगा दर्शन के साथ-साथ शीतल बयार का आनंद ले सकते हैं। 26 खंभों से नीचे का हिस्सा बारादरी के खंभों पर व उसकी दीवारों पर कलात्मक कार्य यूनानी एवं गोथिक शैली में हुआ है। प्रत्येक खंभे पर फूल, बॉर्डर, देवी-देवता, वाद्ययंत्र बजाते हुए स्त्री-पुरुष बने हैं। कई जगह पर शेर का मुख भी बना हुआ है। बाढ़ के समय घाट को कोई नुकसान न पहुंचे, इसलिए पानी के बहाव के लिये दीवारों के बीच कई दरारें (छिद्र) बनाई गई हैं।

कालीन, पीतल व लाल पत्थर

साल 1945 में मीरजापुर में परवान चढ़ी कारपेट आज पूरे विश्व में छाई हुई है। आज भी विश्व पटल पर मीरजापुर का कालीन अपनी अनोखी पहचान बनाए हुए है। जिले का 150 वर्ष पुराना पीतल व्यवसाय भी अपनी पुरानी परंपराओं के बीच विकास के पथ पर अग्रसर है। यहां थार, परात, हंडा, मोटे पीतल के गिलास आदि बर्तनों की साख बराबर है। इसी तरह यहां के लाल पत्थर की भी अपनी अलग पहचान है। इसी पत्थर से अशोक स्तंभ व शिलाएं तैयार की गई थी।


इस जलेबी का स्वाद लंबे अर्से तक रह जाएगा याद

इस जलेबी का स्वाद लंबे अर्से तक रह जाएगा याद

यहां आकर अपने आप मुंह से यही निकलता है। इनका साइज़ ही है इतना बड़ा। सिर्फ एक जलेबी काफी है अंदर तक घुली चाशनी और देसी घी की खुशबू देर तक मुंह का स्वाद बरकरार रखने के लिए। चाहे सिंपल खाएं या रबड़ी के साथ, यह स्वाद आपको लंबे अर्से तक याद रह जाएगा। दोने में रखी एक सादी जलेबी है लगभग 100 ग्राम वजन की, जिसका मूल्य है 50 रुपए, जबकि रबड़ी के साथ इसकी कीमत है 75 रुपए।

स्वाद का सीक्रेट

बहुत पुराना है स्वाद का यह ठिकाना...ऊपर बोर्ड लगा है ओल्ड फेमस जलेबी वाला और स्थापना वर्ष है 1884, पिछली चार पीढ़ियों से यह जगह और यह स्वाद कायम है। बड़े कड़ाहे में छनती बड़ी-बड़ी जलेबियां और बगल में एक कड़ाही में तले जाते समोसे, एक तरफ रखी रबड़ी, चारों ओर फैली घी की खुशबू। खुशबू और स्वाद की खास वजह है शुद्ध देसी घी और देसी खांडसारी चीनी।

ऐसे हुई स्थापना

जलेबी की इस दुकान की स्थापना की थी स्व. लाला नेम चंद जैन ने। बताया जाता है कि वो आगरा से 1884 में मात्र 2 रूपए लेकर दिल्ली आ गए थे। इसी पैसे से उन्होंने अपना छोटा सा कारोबार शुरू किया और आज यहां तक पहुंच गए। जलेबी का यह स्वाद पाने तक उन्होंने कई तरीके आजमाए, इंग्रेडिएंट्स में बदलाव किया, तब जाकर यह स्वाद मिला, जो आज लोगों की जुबान पर चढ़ कर बोल रहा है। आज यह तो नहीं है लेकिन उनकी भावी पीढ़ियां स्वाद की इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। 

चर्चे इनके दूर-दूर तक 

इन जलेबियों का स्वाद दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। चौथी पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते यह देश के कई हिस्सों तक पहुंच चुका है। लोग इन्हें शादी-ब्याह के ऑर्डर देते हैं। दिल्ली घूमने वाले भी यहां आते हैं। देश के बाहर भी यूएस, यूके, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया और केनेडा तक इस स्वाद की धमक पहुंची है। मशहूर राजनीतिज्ञों से लेकर फिल्म स्टॉर्स तक इन जलेबियों का स्वाद लेने लाल किले के पास बनी इस दुकान तक पहुंचते हैं। स्वाद का यह ठिकाना राजनैतिक मतभेदों और धार्मिक मतभेदों से दूर है। हर वर्ग, जाति, धर्म और राजनीतिक दल के लोग इस स्वाद के मुरीद हैं। 


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