करना चाहते हैं स्वर्ग की सैर, तो एक बार जरूर जाएं शत्रुंजय पहाड़ी

करना चाहते हैं स्वर्ग की सैर, तो एक बार जरूर जाएं शत्रुंजय पहाड़ी

आधुनिक लोग में तनाव भरी ज़िंदगी जीने के आदी हो गए हैं। इससे मानसिक और शारीरिक सेहत पर बुरा असर पड़ता है। विशेषज्ञों की मानें तो तनाव से बचने के लिए लोगों को ध्यान योग करना चाहिए। साथ ही जीवनशैली में सुधार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रकृति के साथ थोड़ा समय बिताना चाहिए। इसके लिए चिकित्सक लोगों को अध्यात्म केंद्र जाने की सलाह देते हैं। अगर आप भी मानसिक शांति के लिए घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो शत्रुंजय पहाड़ी की यात्रा कर सकते हैं। यह पहाड़ी स्वर्ग के सुख की अनुभूति से कम नहीं है, जो अध्यात्म और शांति के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। अगर आपको इस पहाड़ी के बारे में नहीं पता है, तो आइए जानते हैं-

शत्रुंजय पहाड़ी कहां है

यह पहाड़ी गुजरात राज्य के ऐतिहासिक शहर पालीताना के समीप है। इस शहर के नजदीक पांच पहाड़ियां हैं। इनमें सबसे पवित्र शत्रुंजय पहाड़ी है। इस पहाड़ी पर सैकड़ों जैन मंदिर हैं। यह स्थल समुद्र तल से 164 फ़ीट ऊंचाई पर स्थित है। इस पहाड़ी पर एक दो नहीं, बल्कि 865 मंदिर हैं और पहाड़ी पर पहुंचने के लिए पत्थरों की 375 सीढ़ियां हैं। शंत्रुजय का शाब्दिक अर्थ विजय होता है।


ऐसा कहा जाता है कि मंदिरों का निर्माण 900 सौ साल पहले करवाया गया था। कार्तिक पूर्णिमा के दिन काफी संख्या में लोग शत्रुंजय पहाड़ी पर इकठ्ठा होते हैं जो नवंबर और दिसंबर महीने में पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि जैन धर्म के संस्थापक आदिनाथ ने शिखर पर स्थित वृक्ष के नीचे कठिन तपस्या की थी। इस स्थल पर आज आदिनाथ का मंदिर है। मंदिर परिसर में मुस्लिम संत अंगार पीर का मजार भी है। इन्होंने मुगलों से शंत्रुजय पहाड़ी की रक्षा की थी। इसके लिए संत अंगार पीर को मानने वाले मुस्लिम लोग भी शत्रुंजय पहाड़ी आते हैं और मजार पर मत्था टेकते हैं। अतः जब भी मौका मिले, तो एक बार शत्रुंजय पहाड़ी जरूर जाएं।


ये 5 जगहें,इनमें से एक स्थान पर लोग मरते नहीं

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जब बात हिमालय की आती है, तो मानसरोवर, कैलाश अमरनाथ आदि पवित्र स्थानों की याद आ जाती है। इसके अलावा भी हिमालय में कई ऐसे स्थान हैं जो अपनी रहस्यों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। आज तक विज्ञान हिमालय के कई रहस्यों से पर्दा उठाने में सफल नहीं हो सका है। कई बार वैज्ञानिक इनमें से एक-दो जगहों पर पहुंचने की कोशिश की है। इस काम में भी वैज्ञानिकों को सफलता नहीं मिल पाई है। अगर आप भी इन जगहों से वाकिफ नहीं है, तो आइए हिमालय की रहस्यमयी जगहों के बारे में विस्तार से जानते हैं-

ज्ञानगंज

आधुनिक समय में ज्ञानगंज तिब्बत में कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के निकट स्थित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस जगह पर एक आश्रम है, जिसका निर्माण विश्वकर्मा जी ने की है। इस जगह पर आज भी भगवान राम, श्रीकृष्ण, बुद्ध आदि शरीर रूप में उपस्थित हैं। इसके साथ ही इस आश्रम में महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, महायोगी गोरखनाथ, श्रीमद शंकराचार्य, भीष्म, कृपाचार्य, कणाद, पुलस्त्य, अत्रि आदि को भौतिक रूपों में देखा जा सकता है। जबकि सैकड़ों ऋषिगण हजारों वर्षों से ध्यान करते देखे जा सकते हैं। इस स्थान के बारे में सर्वप्रथम स्वामी विशुद्धानंद परमहंस ने लोगों को जानकारी दी थी।


कोंगका ला दर्रा

हिमालय की गोद में बसा कोंगका ला दर्रा, लद्दाख में स्थित है। इस जगह पर जाना बेहद मुश्किल है क्योंकि यह दर्रा बर्फ से ढ़की है। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद एक सहमति बनी। इस सहमति के तहत दोनों देशों के सैनिक इस जगह पर मार्च नहीं कर सकते हैं, बल्कि दूर से ही इसकी निगरानी कर सकते हैं। उस समय से यह जगह वीरान है। इस बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ सिद्ध पुरुष कोंगका ला दर्रा पर जाते हैं। जहां उन्हें उड़न तश्तरी देखने को मिलता है। अगर कोई व्यक्ति उड़न तश्तरी देखना चाहता है तो कोंगका ला दर्रा में इसे देख सकता है क्योंकि इस जगह पर हर महीने एलियंस आते हैं। लोगों की आवाजाही कम होने की वजह से एलियंस अपनी उड़न तस्तरी लेकर कोंगका ला दर्रा आते-जाते रहते हैं। विज्ञान अब तक उड़न तश्तरी की पहेली को सुलझा नहीं पाया है। इसलिए कोंगका ला दर्रा में एलियंस के आने का रहस्य अब भी बरकरार है।

"गंगखर पुनसुम"

जानकारों की मानें तो यह दुनिया में सबसे ऊंचा पर्वत है और आज तक इस पर्वत शिखर पर कोई पहुंच नहीं पाया है। दुनिया में यह इकलौता पर्वत है, जिसकी चोटी पर कोई नहीं चढ़ सका है। यह पर्वत भूटान में है। इस पर्वत पर अर्धमानव यति रहता है। कई बार पर्वतारोहियों सहित स्थानीय लोगों ने भी यति देखने का दावा किया है। तिब्बत के लोग इससे डरते हैं और इसकी पूजा करते भी हैं। वहीं, तिब्बती लोग ऊंचे पहाड़ों को भगवान मानते हैं। इसके लिए भी लोगों को "गंगखर पुनसुम" की चोटी पर  जाने की अनुमति नहीं है।

टाइगर नेस्ट मठ

यह मठ खड़ी चट्टान के किनारे स्थित है। इस मठ के मध्य में एक गुफा है। ऐसा कहा जाता है कि गुरु पद्मसंभव ने तीन साल, तीन महीने, तीन दिन और तीन घंटे तक कठिन तपस्या की थी। गुरु पद्मसंभव दूसरे बुद्ध के रूप में जाने जाते हैं। ऐसा कहा जाता है बाघिन पर चढ़कर गुरु पद्मसंभव इस गुफा तक पहुंचे थे। अतः इसे टाइगर मठ के नाम से जाना जाता है। सन 1962 में मठ को बनाया गया, जो आज भी अवस्थित है।

गुरुडोंगमार झील

इस झील का संबंध गुरु पद्मसंभव है। ऐसा माना जाता है कि स्थानीय लोगों के अनुरोध पर गुरु पद्मसंभव ने झील एक हिस्से पर हाथ रखा। इसके बाद से कड़ाके सर्दी के दिनों में भी यह झील का यह स्थान नहीं जमता है। बाकी पूरा झील जम जाता है। यह झील भी सदियों से स्थानीय लोगों के लिए जल का साधन है।  गुरु पद्मसंभव को तांत्रिक भी माना जाता है।


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