भीड़ से दूर कोल्लम की ये जगहें हैं सैर-सपाटे के लिए बेहतरीन, न करें इन्हें मिस

भीड़ से दूर कोल्लम की ये जगहें हैं सैर-सपाटे के लिए बेहतरीन, न करें इन्हें मिस

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है कोल्लम शहर और जिला। यहां आप आधुनिक जीवनशैली और प्राचीन इतिहास को एक साथ जीता हुआ देख सकते हैं। यहां पर ब्रिटिश भारत के इतिहास की कई पहचान हैं तो उनके साथ-साथ विकसित हुई आधुनिक भारत और विशेषकर आधुनिक केरल की छवि तैयार करने वाले प्रतीक भी हैं। जानेंगे शहर की खास घूमने-फिरने वाली जगहों के बारे में...

केरल का गेटवे: क्विलॉन

पुराने समय में कोल्लम, क्विलॉन के नाम से जाना जाता था। कोल्लम रेलवे स्टेशन पर अभी भी यह नाम चलता है। अंग्रेजों के समय यह नाम काफी प्रचलित हुआ। कोल्लम संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है काली मिर्च! मालाबार तट के सबसे पुराने बंदरगाहों में से एक यहां भी है, इसलिए इसे 'केरल का गेटवे' कहा जाता था।मनरो आइलैंड

मनरो आइलैंड यह कोल्लम के पर्यटन मानचित्र का चमकता हुआ सितारा है। यह कुछ द्वीपों का समूह है, जो काफी पहले ईसाई मिशनरियों को कर्नल मनरो द्वारा यहां पर पुनर्वास केंद्र खोलने के लिए दिया गया। इस स्थान की अपनी ही दुनिया है।

एडवेंचर पार्क

अष्टमुडी झील के किनारे बने इस शहरी किस्म के पार्क में प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ तरह-तरह के खेलकूद का आनंद लिया जा सकता है। स्थानीय लोग यहां पिकनिक मनाने आते हैं। यहां ट्रेकिंग के शौकीन भी आते हैं।महात्मा गांधी बीच पार्क

यह कोल्लम बीच पर स्थित है। यहां टिकट लेकर प्रवेश किया जा सकता है, जहां बच्चों और बड़ों के लिए झूले और अन्य खेलकूद की सुविधा है। यहां पर यक्षिणी की एक बड़ी-सी मूर्ति है। इस पार्क के भीतर खाने-पीने की सुविधा भी उपलब्ध है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल पुलिस म्यूजियम

कोल्लम में लाल बहादुर शास्त्री पुलिस संग्रहालय भी है। यहां कोल्लम के प्रशासनिक इतिहास से जुड़ी तस्वीरों और वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया है। यहां आप एक अनोखी चीज भी देख सकते हैं। दरअसल, इस संग्रहालय में तरह-तरह के घावों कोपहचानने और औजारों से जुड़ी वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है।

कोल्लम लाइब्रेरी और कला केंद्र

यह परिसर अपने आप में अनूठा है। पढ़ने-लिखने और कला में रुचि रखने वाले लोग यहां खूब आते हैं। इस परिसर के बरगद के वृक्षों की जटाओं को कलाकारों ने बड़े-बड़े सांपों की शक्ल में पेंट किया है। उन्हें देखने अवश्य जाना चाहिए।

कैसे जाएं, कब जाएं?

कोल्लम रेल के माध्यम से देश के अन्य भागों से जुड़ा हुआ है। यहां सड़क मार्ग से भी जाया जा सकता है। नजदीकी हवाई अड्डा तिरुवनंतपुरम लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है। एलेप्पी से राष्ट्रीय जलमार्ग के रास्ते भी कोल्लम तक पहुंचा जा सकता है। यहां पर रहने के लिए लॉज से लेकर फाइव स्टार होटल तक हैं। झील में खड़े हाउसबोट और रिसोर्ट का आनंद अतुलनीय है। यहां आप किसी भी मौसम में जा सकते हैं। 


इस जलेबी का स्वाद लंबे अर्से तक रह जाएगा याद

इस जलेबी का स्वाद लंबे अर्से तक रह जाएगा याद

यहां आकर अपने आप मुंह से यही निकलता है। इनका साइज़ ही है इतना बड़ा। सिर्फ एक जलेबी काफी है अंदर तक घुली चाशनी और देसी घी की खुशबू देर तक मुंह का स्वाद बरकरार रखने के लिए। चाहे सिंपल खाएं या रबड़ी के साथ, यह स्वाद आपको लंबे अर्से तक याद रह जाएगा। दोने में रखी एक सादी जलेबी है लगभग 100 ग्राम वजन की, जिसका मूल्य है 50 रुपए, जबकि रबड़ी के साथ इसकी कीमत है 75 रुपए।

स्वाद का सीक्रेट

बहुत पुराना है स्वाद का यह ठिकाना...ऊपर बोर्ड लगा है ओल्ड फेमस जलेबी वाला और स्थापना वर्ष है 1884, पिछली चार पीढ़ियों से यह जगह और यह स्वाद कायम है। बड़े कड़ाहे में छनती बड़ी-बड़ी जलेबियां और बगल में एक कड़ाही में तले जाते समोसे, एक तरफ रखी रबड़ी, चारों ओर फैली घी की खुशबू। खुशबू और स्वाद की खास वजह है शुद्ध देसी घी और देसी खांडसारी चीनी।

ऐसे हुई स्थापना

जलेबी की इस दुकान की स्थापना की थी स्व. लाला नेम चंद जैन ने। बताया जाता है कि वो आगरा से 1884 में मात्र 2 रूपए लेकर दिल्ली आ गए थे। इसी पैसे से उन्होंने अपना छोटा सा कारोबार शुरू किया और आज यहां तक पहुंच गए। जलेबी का यह स्वाद पाने तक उन्होंने कई तरीके आजमाए, इंग्रेडिएंट्स में बदलाव किया, तब जाकर यह स्वाद मिला, जो आज लोगों की जुबान पर चढ़ कर बोल रहा है। आज यह तो नहीं है लेकिन उनकी भावी पीढ़ियां स्वाद की इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। 

चर्चे इनके दूर-दूर तक 

इन जलेबियों का स्वाद दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। चौथी पीढ़ी तक पहुंचते-पहुंचते यह देश के कई हिस्सों तक पहुंच चुका है। लोग इन्हें शादी-ब्याह के ऑर्डर देते हैं। दिल्ली घूमने वाले भी यहां आते हैं। देश के बाहर भी यूएस, यूके, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया और केनेडा तक इस स्वाद की धमक पहुंची है। मशहूर राजनीतिज्ञों से लेकर फिल्म स्टॉर्स तक इन जलेबियों का स्वाद लेने लाल किले के पास बनी इस दुकान तक पहुंचते हैं। स्वाद का यह ठिकाना राजनैतिक मतभेदों और धार्मिक मतभेदों से दूर है। हर वर्ग, जाति, धर्म और राजनीतिक दल के लोग इस स्वाद के मुरीद हैं। 


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