तेजी से अपना रहे है लोग यह ट्रेंड, जाने

तेजी से अपना रहे है लोग यह ट्रेंड, जाने

हॉलैंड के नाम से मशहूर देश नीदलैंड्स के एक ग्रामीण इलाके रूवर से शुरू हुआ एक ट्रेंड दुनिया भर में अपनाया जा रहा है. इस तरह की खबरें आईं कि रूवर में ‘को नफलेन’ डच भाषा का शब्द जिसका अर्थ है गाय को गले लगाना प्रैक्टिस शुरू हुई और देखते ही देखते दुनिया भर के लोग इसे अपनाने लगे. ऐसा क्यों हुआ? इसका कारण बताया गया है कि गाय को गले लगाने से न केवल तनाव से राहत मिलती है बल्कि मा​नसिक स्वास्थ्य के लिहाज़ से किसी पालतू जानवर का साथ बहुत उपयोगी है.

जी हां. वैसे ‘थेरेपी एनिमल’ का कांसेप्ट नया नहीं है, लेकिन कोरोना वायरस की महामारी से जूझने वाली दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से कई लोग जूझ रहे हैं इसलिए यह ट्रेंड काफी पॉपुलर हो रहा है. इस ट्रेंड, गाय को गले लगाने से जुड़ी तमाम दिलचस्प बातें और वैज्ञानिक समझ के बारे में आपको जानकर न केवल मज़ा आएगा बल्कि हो सकता है कि आपको कुछ मदद मिले.

क्या सच में गाय से लिपटने में सुकून है?
पहले तो आपको यह जानना चाहिए कि लिपटने के लिए सबसे ज़्यादा मुफीद पालतू जानवर गाय ही है. साल 2007 में एक स्टडी हुई थी, जिसमें पता चला था कि गाय की गर्दन और पीठ की तरफ कुछ खास नर्म हिस्सों को सहलाया जाए तो गाय को बड़ा आराम मिलता है और वह आपके साथ बहुत दोस्ताना हो जाती है. जो लोग ग्रामीण इलाकों से वास्ता रखते हैं, उन्हें पता है कि दूध दुहने से पहले गाय के साथ इस तरह प्यार किया जाता है.

लेकिन यह सिर्फ गाय के लिए ही फायदेमंद नहीं है. बीबीसी की रिपोर्ट की मानें तो इस तरह के बर्ताव से आपको भी एक सकारात्मक ऊर्जा मिलती है, तनाव कम करने में अहम ऑक्सिटॉसिन हार्मोन शरीर में बढ़ता है, जो आम तौर से सोशल बांडिंग के वक्त शरीर में बनता है. पालतू जानवरों के साथ खेलने में शरीर और मन को शांति मिलती है और ये भी फैक्ट है कि बड़े स्तनधारी पशु के साथ प्यार करने से ज़्यादा.

कोविड-19 : अकेलेपन के साथी हैं पेट्स?
जी हां. इस ट्रेंड के पीछे प्रमुख कारण यही है कि सोशल डिस्टेंसिंग, घरों में कैद होने और सामाजिक गतिविधियों के कम से कम हो जाने के कारण दुनिया भर में लोग अकेलेपन के शिकार हुए हैं. इससे कई तरह की मानसिक समस्याएं पेश आई हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट्स कह रही हैं कि दुनिया भर में कोविड के कारण मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर सेवाएं संभवत: सबसे ज़्यादा प्रभावित हुईं.


यहां अस्थि कलश के लॉकर भी हुए हाउसफुल, मोक्ष कलश योजना से जाएंगे हरिद्वार

यहां अस्थि कलश के लॉकर भी हुए हाउसफुल, मोक्ष कलश योजना से जाएंगे हरिद्वार

इन दिनों कोरोना महामारी में लोगों की मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। श्मशान घाटों में शवों को जलाने के लिए लगी कतारों के बीच सरहदी बाड़मेर के श्मशान घाट में अस्थि कलश के लॉकर अब हाउसफुल हो चुके हैं। लंबे समय से गंगा के पवित्र जल का इंतजार कर रही यह अस्थियां अब मोक्ष कलश योजना से हरिद्वार जाएगी।

अस्थि कलश के लॉकर भी हुए हाउसफुल

कोविड-19 महामारी में श्मशान घाटों में जगह कम पड़ रही है और लोग अपनों के शवों को लेकर घंटों इंतजार कर रहे हैं। सरहदी बाड़मेर जिला मुख्यालय के श्मशान घाट का आलम यह है कि यहां जन अनुशासन पखवाड़े के बाद से 77 शवों को जलाया गया है। जिनमें से 50 फीसदी कोविड संक्रमण की वजह से जान गंवाने वाले लोग थे। श्मशान घाट में बाड़मेर में अस्थि कलश के लॉकर अब हाउसफुल हो चले हैं।


मोक्ष कलश योजना से जाएंगे हरिद्वार

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि अस्थियों को रखने के लिए श्मसान विकास समिति के पास लॉकर नहीं हैं। ऐसे में लकड़ी के संदूक में ही अस्थियों को रखा जा रहा है। लंबे समय से श्मशान के लॉकर में पड़ी अस्थियां हरिद्वार और गंगा के पवित्र पानी का इंतजार कर रही हैं। ऐसे में राजस्थान सरकार की मोक्ष कलश योजना 2020 के तहत राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम की नियमित एक्सप्रेस बस में हरिद्वार जाने व आने के लिये मोक्ष कलश के साथ दो यात्रियों को निःशुल्क यात्रा की अनुमति 5 मई से दी गई है।


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